सिंधिया की साख दांव पर थी, तब कौन साथ था,और कौन छोड़ गया?।
ग्वालियर-चंबल की राजनीति में सत्ता के साथ बदलते चेहरों पर अब सवाल उठना लाजिमी है। जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनीतिक सफर मुश्किल दौर से गुजर रहा था, तब कई स्वार्थी नेताओं ने उनका साथ छोड़कर दूसरे दल का दामन थाम लिया।
लेकिन जैसे ही सत्ता का समीकरण बदला और भाजपा सत्ता में आई, वही चेहरे फिर सत्ता की चौखट पर नजर आने लगे।
सवाल सीधा है—जो मुश्किल वक्त में साथ नहीं खड़े हुए, उन पर सत्ता में आने के बाद कितना भरोसा किया जाए?
कुछ नेता टिकट की चाह में इधर से उधर गए, कुछ को टिकट मिला तो चुनावी मैदान में औंधे मुंह गिरे। ऐसे नेताओं की निष्ठा विचारधारा से है या सिर्फ टिकट और सत्ता की मलाई से?
अब वक्त है कि भाजपा और केंद्रीय मंत्री सिंधिया ऐसे चेहरों पर गंभीरता से मंथन करें।
क्योंकि 2028 का चुनाव दूर नहीं है।
आज जो साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं, कल सत्ता का समीकरण बदलते ही उनमें से कितने साथ रहेंगे और कितने फिर नया ठिकाना तलाशेंगे?
सियासत में दल बदलना आसान है, लेकिन भरोसा बार-बार नहीं बदला जा सकता।
अब फैसला पार्टी को करना है—
निष्ठावान कार्यकर्ता महत्वपूर्ण हैं या अवसर देखकर रंग बदलने वाले नेता?

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